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Sunday, June 20, 2004
premikA AvashyakatA yA faishan

प्रेमिका:आवश्यता या फैशन

प्रेमिका हर युवक की एक जरूरत । पर क्यों? इसका जबाब लाख सोचने पर भी मिल न सका । जूतों के लिए मोजा,जेब के लिए बटुआ,और गर्दन के लिए टाई का औचित्य तो समझ में आता है, पर हर युवाओ के लिए एक प्रेमिका की जरूरत समझ मे नहीं आती है । वैसे कुछ रसिया किस्म के युवक ,जो शायद प्रोफेशनल होते हैं,एक समय मेंं तीन चार प्रेमिकायें रखते हैं और मौसम तथा जरूरत के हिसाब से उनका इस्तेमाल "हेंडल विथ केयर" करते हैं । इस किस्म के रसिया युवक के मित्र भी अच्छे खासे फायदे में रहते थे ।

एक घटना हाल की है,मेरा एक मित्र जो रसिक मिजाज था ,था इसलिए क्योंकि अब उस बोचारे कि हालत धोवी के गदहे जैसी है न घर का न घाट का ,वेचारा बीच का होकर रह गया है। एक लडकी जो उसकी पडोसन थी उसे पसंद आ गयी। पसंद क्यों आ गयी इसके भी कई कारण हैं ।

१. लडकी स्वजातीय थी ,ताकि भविष्य में विवाह इत्यादि में कोई वाधा ना आये और दहेज में मोटी रकम वसूली जा सके ।
२.पडोस में रहने के कारण मिलन-जुलने मे समय और धन की वचत होती है।
३.घर में आना जाना रहने के कारण प्रेमालाप के भी पर्याप्त अवसर मिलते हैं। मसलन घर के सभी सदस्य किसी विवाह आदि में सम्मिलित होने गये हो और आप बंद कमरे में प्रेमिका के साथ "ओले ओले या जवानी की अंगराई "आदि फिल्मों के दृश्यों का अभ्यास कर सकें ।

मेरे मित्र को भी अभ्यास के कई अवसर मिले ,और उसने भी मन लगाकर अभ्यास किया,परिणामस्वरुप वह एक व्यावसायिक प्रेमी बन सका । अब हम मुख्य कहानी पर आते हैं। गोपनीयता को बनाये रखने के लिए हम उसकी प्रेमिका का एक काल्पनिक नाम श्रीदेवी रख लेते हैं।

श्री देवी पर "आँख का अंधा नाम नयन सुख "लोकोक्ति सौ फीसदी सही बैठती थी। वह सौ मीटर की दूरी से शशिकला और नजदीक से ललिता पवार लगती थी । मेरा मित्र जो गणित के "हिट एण्ड ट्रायल मेथड " से काफी प्रभावित था, श्री देवी को ही ट्रायल के लिए चुन लिया । उसने चार पृष्ठीय प्रेम पत्र का मसौदा तैयार किया । लंगोटिया यार होने के नाते मुझे भी प्रेम पत्र पढने का मौका मिला। प्रेम पत्र पढकर मैं तो दंग रह गया । वह प्रेम पत्र कम उसका वायोडाटा अधिक था ।उसके कुछ महत्वपूर्ण अंश मैं नीचे पेश कर रहा हूँ ।


मेरी श्रीदेवी

तूझे प्यार ही प्यार ,

जब से तूम्हें देेखा है ,मेरा दिल वेचैन है । न तो मैं अपने कलर टीवी पर सिनेमा देख पाता हूँ और न ही सीडी प्लेयर पर केई अंग्रेजी मुवी ही देख पाता हूँ । इस गर्मी के मौसम में रेफिर्जरेटर का पानी भी अच्छा नहीं लगता हैं । एयरकंडीशन भी मेरे मन की बेचैनी दूर नही कर पाता हैं। मेरा चार कमरे का फ्लैट मुझे काटने दौड़ता है । जब भी मै अपने मर्सडीज में घूमने निकलता हूं तो बगल की सीट पर तुम बैठी नजर आती हो । पिछले सप्ताह मुझे अपने चार सौ एकड के फार्म हाउस पर जाने का मौका मिला , वहाँ भी ख्यालों मे सिर्फ तुम ही तुम थी । कभी तो दिल करता है कि मै हिन्दुस्तान छोड कर अपने भाईसाहब के पास अमेरिका चला जाऊ । तुमने अगर मेरा प्यार कवूल नहीं किया तो मैं फिनिट पीकर मर जाऊँगा

तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा

कखग



पता नहीं लडकी उसके जान देने की धमकी से प्रभावित हुयी या उसके सुविधा संपन्न फ्लैट से या कार से ,मगर अगले ही दिन उसके प्रेम निवेदन को स्वीकार कर लिया गया । लडकी ने रात के दो बजे छत पर मिलने का वादा किया । नियत समय पर मिलाकात हुयी। चुंबन ,आलिंगन, स्पर्श आदि आवश्यक वस्तुओं का आदान प्रदान हुआ तथा भविष्य में और उदार नीति अपनाने का आश्वान देकर लड़के को विदा किया । पुन: अगले दिन दो बजकर तीस मिनट पर चाँदनी रात में छत पर मुलाकात हुयी । लड़की ने सचमुच ही उदार नीति अपनाई । पूजा भट्ट, ममता कुलकर्णी से शुरु उसने हालीवुड की मर्लिन मुनरो तक को पीछे छोड दिया । इस अप्रत्याशित घटना से लडका चौंक गया, उसे लगने लगा कि लडकी उसे डबल क्रास कर रही है।

छानवीन करने पर सच्चाई सामने आ गयी । मेरा मित्र उसका प्रेमी नं० -१० निकला । उसी दिन सेमेरे मित्र ने प्रेमिका नं०-२ की तलाश प्रारंभ कर दी । पर मैं श्री देवी का प्रेमी नं०-११ बनने के फिराक मेॆ रहने लगा। मौका भी जल्दी मिल गया । मैंने उसके भाई को ट्युशन पढा़ना प्रारंभ किया । एक दिन नियत समय पर उसके घर पहुँचा , संयोग से सभी लोग घर से बाहर गयेे हुये थे , सिर्फ श्री देवी घर मे थी । मैने पूछा -लगता है सभी लोग बाहर गये हैं , कल आऊंगा ।उसने मुझसे चाय पीकर जाने का निवेदन किया । मैने सहर्ष स्वीकार कर लिया । आज पहली बार उसके निजी कमरे मे जाने का मौका मिला था । उसका कमरा ,कमरा कम सिनेमा घर ज्यादा लग रहा था । दीवारो पर अभिनेताओं की मांसपेशियां दिखाती तस्वीरे लगी हुयी थी। कुछ अर्धनग्न अभिनेत्रियों की भी तस्वीरे थी । मुझे घबराहट होने लगी, तभी श्री देवी चाय लेकर आ गयी ।

मैं नजरे झुकाकर चाय पीने लगा क्योकि वह मुझे घूर-घूर देख रही थी,जैसे कोई पंछी जाल मे फंसने वाला हो । उसने चुप्पी तोडते हुये कहा -आप बहुत हैंडसम दिख रहे हैं । पहली बार किसी लडकी के मुँह से तारीफ वह भी झूठी ,मेरेे लिए अप्रत्याशित था क्योंकि मुझे किसी भी कोण से हैंडसम नहीं कहा जा सकता था । मुझे खतरे का अहसास हुआ , पर जब ओखली मे सिर डाल दिया तो मूसल से क्या डरना । मैनैं भी मोनालिसा मुस्कुराहट चेहरे पर लाते हुए कहा-आप भी तो ममता कुलकर्णी की तरह दिख रही हैं । इसका उस पर सकारात्मक प्रभाव पडा और मुस्कुराकर उसने मेरे हाथ से खाली कप प्लेट ले लिया । इस क्रम में उसने मेरा हाथ पकड लिया । मुझे बिजली के करंट सा झटका लगा और मैने खिसक लेने मे ही भलाई समझी । अच्छा मै चलता हूँ,कल इसी समय आउँगा । गुडू को घर पर ही रहने को कहिएगा -यह कहकर मैॆने इजाजत चाही । 'थोडी देर रुक जाइये न ,मैॆ पकौडे तल रही हूँ,खाकर जाइये-उसने आग्रह किया ।उसके आग्रह में मुझे कोई रहस्य छिपा नजर आया ,मैं उस रहस्य को हर कीमत पर जानना चाहता था । बिना जोखिम उठाये किसी लाभ की कामना नहीं की जा सकती है ।

पाँच मिनट बाद वह पकौडे लेकर आ गयी । मैं पकौडे खाने लगा । अचानक वह मेरे बगल मे आकर बैठ गयी । एक पकौडे मेरे हाथों से भी खाइये-उसने जिद किया । मैं भला इंकार कैसे करता ,इक्कीस साल के जीवन मे यह पहला मौका आया था । एक के बाद दूसरा , दूसरे के बाद तीसरा और इसी क्रम में वह मेरे नजदीक आती गयी और जब तक मैं आखरी पकौडा खाता ,कोई दूसरी चीज ही खाने के लिए प्रस्तुत कर दी गयी थी । न ही बह पकौडा था और न ही समोसा ,न ही सख्त और न ही अत्यधिक मुलायम । दीवार पर टंगी अर्धनग्न तस्वीर की सजीव प्रतिमूर्ति । आँखों में अजीब आकर्षण था ,बातचीत का दौर खत्म हो चुका था ,अब कुछ कर दिखाने का समय आ गया था । उसने मेरा हाथ पकड कर मेरा मार्ग दर्शन किया । पहले मैंने दुर्गम चढाइयों को पार किया और फिर अनंत गहराइयों मे खो गया । जब बाहर निकला तो बडा़ अच्छा फिल कर रहा था । जाते -जाते उसने वोनस के रुप मे एक विलायती चुंवन दिया ,जिसकी कडवाहट आज भी अनुभव करता हूँ ।

मरे मित्र ने जल्दी ही प्रेमिका नं०-२ खोज ली । प्रेम जात-पात, अमीर-गरीव और उम्र कुछ नहीं देखता इसका अनुसरण करते हुये उसने अपने सेे उम्र में बडी एक लडकी से प्रेम कर लिया । प्रतिदिन सजसंवर कर मेरे मित्र मिलने जाते ,दिनभर की खिदमत के बदले मेेेेें सिर्फ देशी चुंवन ही हासिल होता था । ये लडकी भी कुछ पेशेवर अंदाज की थी,'प्रेमी कम नौकर' के सिद्धांत का इस्तेमाल करती थी । बेचारा दिन भर स्टेपनी की तरह घूमता , फिर भी सिर्फ 'देशी' ही मिलता था। 'विलायती' हासिल करने में उसे तीन महीने लगे । इस दौरान तीन हजार रुपया भी खर्च हो गया । बेचारा टेस्ट मैच ही खेलता रह गया ,वन डे मैच खेलने का मौका ही नहीं मिला । खीझकर उसने प्रेमिका नं०-२ से सन्यास ले लिया ।

अपने मित्र के टेस्ट मैच के दौरान भी मुलाकात उसकी प्रेमिका नं०-२ से होती रहती थी । अपने स्टेपनी को पंचर होते देखकर उसने मुझे अपना स्टेपनी बनाना चाहा । मैंने भी एक शातिर खिलाडी की तरह एडवांस में ही एक विलायती की मांग कर दी,मुझे पेशगी मिल भी गयी । अगले ही दिन उसने मुझे एक सुनसान पार्क मेॆ बुलाया , जहां अकसर प्रेमी युगल अपने रोमांस को फाइनल टच देने के लिए जाते थे । नियत समय से कुछ पहले ही मैं वहां पहुंच गया । कुछ प्रेमी युगल झाडी की आड में प्रेम का व्यापार कर रहे थे । ऐसा प्रतीत हो रहा था , जैसे प्रेम का सेल लगा हो। पार्क के दूसरे छोर पर कुछ झाडियाँ और पेड था , समय व्यतीत करने के लिये मैं उस ओर बढ़ गया । झाडियो के पीछे से कुछ अजीवों-गरीव ध्वनियां आ रही थी ,जो कभी धीमी हो जाती थी और कभी तेज । मैंने एक खोजी निगाह झाडी के उपर डाला ,एक आकृति पेंडुलम की तरह उपर नीचे झुलती नजर आयी । इतने में मेरी प्रेमिका ने पीछे से मुझे आवाज लगायी । तुम यहाँ खडे हो, मैं तुम्हे पूरे पार्क मे खोज रही थी-उसने कहा । चलो मैं तुम्हारा परिचय अपनी एक सहेली से करवाती हूँ-उसने कहा ।

उसकी सहेली आकर्षक थी। मैंने खोजी निगाहों से उसका डायमेंशन माप लिया , जो स्टैण्डर्ड आकडों से विल्कुल मेल खाता था । उसने हैलो कहकर हाथ बढाया,मैने हाय कहकर उसका हाथ लपक लिया । काफी नर्म मुलायम त्वचा थी । हमलोग पार्क के बेंच जो झाडियों के करीव थी,बैठ गये । मैं दोनो के बीच मे बैठा था । इतने में एक युवक झाडियों से पतलून ठीक करता हुआ बाहर निकला । हमलोगों को देखते ही उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान फैल गयी । क्या भाई साहब दोनो हाथ मेॆ लड्डू -यह जुमला फेंककर वह चला गया ।

हमलोगों ने बातचीत का क्रम प्रारंभ किया । पहले पढाई के संबंध मे,फिर राजनीति पर ,फिर सिनेमा ,समाज ,सह-शिक्षा से होते हुए विवाह पूर्व लैंगिक सवंधों पर बातचीत करने लगे । मैं विवाह पूर्व लैेगिक संवंधों के सख्त खिलाफ था जबकि लडकियां इसका पुरजोर समर्थन कर रही थी। उनका मानना था कि अगर पुरुषों के लिए ऐसे संवंध रखने पर उन्हें बुरे नजरों से नहीं देखा जाता है तो स्त्रियों को भी समानता का दर्जा मिलना चाहिए । ऐसा करने से स्त्रियों की दशा मेॆ सुधार होगा और देश तरक्की करेगा । अंधेरा होने लगा था, मैने वापस चलने का अनुरोध किया। अरे अभी को साढे छह ही बजे हैं,थोडी देर और बैठते हैं-प्रेमिका ने कहा । मैं बहुत डर रहा था ,क्योकि अभी-अभी उन्होने विवाह पूर्व संवंधो पर जमकर बहस की थी और अगर तत्काल उस पर अमल करना प्रारंभ कर देती तो मेरे लिए संकट की स्थिति पैदा हो जाती । सचमुच मेरे लिए एक साथ दो-दो लड्डू खाना मुश्किल हो जाता ।

मेरी प्रेमिका की सहेली कुछ खुलकर बातें करने लगी थी और बातचीत के दौरान ही दोनो सहेलियों ने दो फूल एक माली की तरह दोनो तरफ से मुझे जकड लिया। बन डे मैच के स्पष्ट आसार नजर आ रहे थे। पहले ही वाउंसर के रुप में एक साथ दो विलायती चुंवन मिला , फिर स्पिन और गुगली की जो झडी लगी तो मेरे लिए एक -एक रन जोडना मुश्किन हो रहा था । बडी मुश्किल से मैं क्रीज पर टिका रहा । पार्क में घिर आये अंधेरे ने हमारे मैच मे चार चाँद लगा दिया । पार्क में लगी छह फीट लंबी बेंच की सार्थकता अब समझ में आ रहा था । मैंने भी अपना धैर्य नहीं खोया और सेंचुरी बनाकर ही दम लिया । प्रेमिका की सहेली जो अति उतेजना में हिन्दी भूल गयी थी ,बोली-हाउ नाइस ,यू हैव गाट ए विग माउस । मै घवराहट में इसका मतलव नहीं समझ सका । अस्त-व्यस्त कपडो को ठीक कर पार्क से खिसक लेने में ही भलाई समझी । मैंने रास्ते में निर्णय लिया कि अब दुबारा अपनी प्रेमिका से नहीं मिलूंगा । शुक्र था की आज वह केवल दो थी , आधी दर्जन होती तो मेरा अंजाम क्या होता, इसकी कल्पना मात्र की जा सकती है ।

अपने रसिक मित्र के संगति से जो अनुभव मुझे मिला था ,वह मेरे लिए पर्याप्त था । अब मैं बैसे मित्रों और उनकी प्रेमिकाओ से दूर ही रहता हूँ । इसके बाद भी कई अॉफर आये लेकिन सभी को समय और धन की बर्बादी समझ कर, मैने ठुकरा दिया । मेरा रसिक मित्र आजकल महिला कॉलेज के आगे मूंगफली बेचता है। प्रेमिकाओ के चक्कर मे पडकर उसका जो यह हाल हुआ है ,वह निश्चय ही हम युबाओ के लिए एक सबक है । फैशन या मित्रो पर धाक जमाने के लिए प्रेमिका रखना निश्चित तौर पर भारी पर सकता है । अत:हे युवा जन आप मेरे अनुभवो से लाभ उठाये और छात्र जीवन मे अपने लिए निर्धारित एकमात्र कर्म पठन-पाठन पर अपना ध्यान केन्द्रित करें । इस मेहनत और सक्रियता की आयु में प्रेमिकाएं आपको वास्तविकता से दूर सपनो की दुनिया मे ले जाएगी ,जहॉ से बापस लौटने पर आप अपना सब कुछ खो चुके होंगे । निष्कर्ष रुप मे प्रेमिका फैशन की वस्तु है,और इससे बचना चाहिए ।

जनहित मे जारी

( युवा कल्याण मंत्रालय )

Posted at 10:46 am by bhagat
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Sunday, April 25, 2004
langota purANa लंगोट पुराण

langota purANa लंगोट पुराण

शुरुआत कहाँ से करूं यह समझ नहीं पा रहा हूँ, क्योंकि विषय ही मैंने ऐसा चुना है। संकोच भी हो रहा है, पर लिखना भी चाह रहा हूँ। खैर, मैं अपनी झिझक और संकोच को त्याग कर प्रारंभ करता हूँ। सर्वप्रथम आप पाठकगणों को अपनी विषय-वस्तु से अवगत करा दूँ। मैंने हमेशा से ही 'उपेक्षित वस्तुओं' को अपने लेखन का विषय बनाया है। मैं उस वस्तु का नाम लिये बगैर प्रारंभ करता हूँ और आशा करता हूँ कि आप विद्वान पाथकगण 'गेस' कर लेंगे कि 'विषयवस्तु' क्या है।

यह हमारे नियमित इस्तेमाल् की वस्तु है, स्त्री-पुरुष दोनों के काम की चीज है। हर उम्र, हर वर्ग के लोग एसका इस्तेमाल करते हैं। चलिये एक 'क्लू' और देता हूँ, इसका संबंध हमारी पोशाक से है। क्या कहा आपने, 'कमीज' । श्रीमान्, महिलायें भारतवर्ष में कमीज तो पहनतीं नहीं, अगर आप चंद आधुनिक युवतियों को छोड़ दें तो । हमारी गरीब जनता को अभी कमीज जैसी विलासिता की वस्तु उपलब्ध कहाँ ।

आप् अभी तक नहीं समझे और् मुझे भी सीधे-सीधे नाम बताने में संकोच हो रहा है। आइये हम उस वस्तु के क्रमिक विकास और इतिहास को जानने का प्रयास करते हैं । उस वस्तु का सर्वप्रथम प्रयोग किस काल में हुआ इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता है । आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि सर्वप्रथम इसका प्रयोग यूरोप में प्रारंभ हुआ । बाद में यह अन्य देशों में प्रयोग में लाया जाने लगा । अब मैं आपको और 'सस्पेंस' में नहीं रखना चाहता क्योंकि कभी-कभी अत्यधिक उत्सुकता आशानुकूल चीज न पाकर घोर निराशा में बदल जाती है। अत: इस अपराध से बचने के लिये उस वस्तु का नाम बता देता हूँ - लंगोटा, कच्छा, अंडरवीअर, पैण्टी इत्यादि पर्यायवाची शब्द हैं उस वस्तु के ।

जैसा कि मैं कह रहा था , यूरोपीय लोग इसे अपनी देन कहते हैं, जैसा कि हाल ही में उन्होने हळी, तुलसी और बासमती चावल को पेटेंट करवाया है । अतः शायद अंडरवीअर का नंबर आया है । खबरदार जो उन्होने ऐसा किया, दुनिया जानती है कि प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में इसका प्रयोग हो रहा है । वे लोग बारहवीं या चौदहवीं शताब्दी की बात करते हैं जबकि लंगोट का प्रयोग सर्वप्रथम हनुमान जी ने सतयुग में किया था । उस जमाने में लंगोट को पोपुलर करने के लिये हनुमान जी सिर्फ लंगोट पहन कर और गदा कंधे पर लेकर घूमा करते थे । कहा जाता है कि उनकी पर्सनालिटी और 'मसल' देख कर समूची वानर सेना ने लंगोट को अपनाया था । कालांतर में हनुमान जी के नाम पर लंगोट बैचलर का ट्रेडमार्क बन गया । उस जमाने में लंगोट साहस ऐवं संयम का प्रतीक माना जाता था और प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को लंगोट पहनाते थे । इसलिये त्रेतायुग में यशोदा मैया ने श्रीकृष्ण को लंगोट पहनाया था । अतः यह निर्विरोध साबित होता है कि अंडरवीअर या कच्छे का विकास भारतवर्ष में ही हुआ है ।

हनुमान जी ने लंगोट का डिज़ाइन स्वयं तैयार किया था और आज के बड़े बड़े फैशन डिज़ाइनर आश्चर्यचकित हैं कि हनुमान जी के पास ना तो फैशन टेक्नोलोजी में डिप्लोमा था और न ही आज की तरह सिलाई मशीन । हनुमान जी ने कम खर्च में लंगोट का निर्माण कर उसे समाज के हर वर्ग के लिये उपलब्ध करवाया । मजदूर से लेकर राजा तक सभी एक ही लंगोट मेड इन इंडिया पहनते थे जिसका प्रमाण हनुमान जी की प्रतिमाएं हैं जो हर गली और् चौराहे पर स्थापित हैं । सभी प्रतिमाओं में हनुमान जी 'क्लोज़-अप' स्माइल के साथ लंगोट धारण किये रहते हैं । अतः हे पेटेंट धारकों, सावधान! हमसे नहीं तो कम से कम हनुमान जी की गदा से डरो, जिसके एक प्रहार से समूचा युनीवर्स अनबैलेंस हो जाता है, तो तुम्हारी क्या मजाल?

कालांतर में समाज चार वर्गों में विभाजित हुआ । परिणाम स्वरुप लंगोट के विभिन्न रूप विकसित हुए । क्षत्रिय वर्ग जो शासक वर्ग था और जिनका ट्रेडमार्क लग्ज़री था, ने रेशम का लंगोट बनवाया । यह हनुमान जी के लंगोट से थोड़ा भिन्न था । जहाँ हनुमान जी का लंगोट संयम का प्रतीक था अर्थात् एक बार कसकर बांध लेने के बाद अप्सराओं की कामुक अदाएं भी उसे खोल नहीं पातीं थीं, वहाँ लग्ज़री रेशमी लंगोट रमणी की एक अदा पर खुल जाते थे । अर्थात् एकदम कम्फर्टेबल था, दिन भर में कई बार खोला या पहना जा सकता था ।

लंगोट के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ वैश्य वर्ग ने किया । व्यावसायिक मानसिकता के अनुसार उसने गुप्तांगों को ढकने के लिये बने लंगोट में गुप्त थैलियां बनवायीं, जिसमें वे स्वर्णमुद्राएं या कीमती वस्तुओं को रख कर आवागमन कर सकें । यकीन मानिये, सैकड़ों वर्षों तक दूसरे वर्ग के लोगों को इसका आभास तक न हो सका और स्वर्णमुद्राएं गुप्त स्थान पर गुप्त अंगों की चौकीदारी में 'सेफ' रही ।

ब्राह्मणों ने हनुमान जी के लंगोट के साथ किसी प्रकार का छेड़-छाड़ ना कर उसका प्रयोग जारी रखा लेकिन बैचलर ट्रेडमार्क खत्म हो गया । लंगोटधारी साधुओं का एक् वर्ग पनपा जो कहने को तो धैर्य और संयम का प्रतीक था परन्तु व्यवहार में पाखण्डी और धूर्त ।

केवल शूद्रों ने हनुमान जी के लंगोट को आत्मसात किया । वे सिर्फ लंगोट पहनते थे और कठिन मेहनत करते थे ।  न तो उन्होने लंगोट की बनावट को 'मैनीपुलेट' किया और न ही व्यवहारिक तौर पर उसकी प्रतिष्ठा में आंच आने दी ।

मध्य काल में लंगोट की बनावट और उसका प्रयोग विधिवत जारी रहा । ना तो उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और न ही व्यवहार में । हाँ, एक खास परिवर्तन जो आया वह यह कि बोलचाल की भाषा और साहित्य में इसके लाक्षणिक प्रयोग प्रारंभ हो गये । जैसे लंगोटिया यार अर्थात् दो ऐसे मित्र जिनकी दोस्ती उस जमाने से हो जब वे लंगोटी पहनते थे ( या कभी कभी पहनते थे, क्योंकि बच्चे बिन कपड़ों के ज्यादा हैंडसम लगते हैं, उनमें समानता का भाव रहता है इसी कारण श्रीकॄष्ण गोपियों के साथ या कभी-कभी गोपिकाओं के साथ इसी रूप में घूमते थे । )
'भागते भूत की लंगोटी' का भी बहुविधि प्रयोग मिलता है । इसका वस्तविक अर्थ है कि जब सब कुछ नष्ट हो रहा हो तो जो कुछ भी मिल जाये तो वही बहुत है । जबकि पुलिस वाले इसका अर्थ कुछ और लगाते हैं । उनके अनुसार अगर भागते हुए भूत की लंगोटी उनके हाथ लग जाय तो वे उस भूत को पाताल से भी खोज निकालेंगे, फिर जिन्दा मानवरूपी अपराधी की क्या बिसात । सच्चाई क्या है, इससे आप भली-भांति परिचित हैं । हाल ही में एक मंत्रीपुत्र एक युवती के शीलहरण के पश्च्यात मौका-ए-वारदात पर अपना लंगोट भूल गया और सूचना पाकर पुलीस समय से पहुंची अर्थात् जब युवती की चरित्र तालिका में शुन्य अंक बचे थे । पुलीस ने लंगोट को अपने प्रशिक्षित किसी विदेशी नस्ल के कुत्ते को सुंघाया, कुत्ता मौक-ए-वारदात पर मूर्छित हो गया। लंगोट को जांच हेतु विदेश भेजा गया है । पुलीस मामले की तहकीकात कर रही है ।

एक खास परिवर्तन यह आया कि लंगोट अब प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया । जैसे - सेठ रामलाल ली लंगोट तक नीलाम हो गयी, अर्थात् सेठ रामलाल कौड़ी-कौड़ी के मुंहताज हो गये । कहते हैं कि एक् बार व्यापार घाटे में श्यामलाल का सब कुछ नीलाम हो गया, वे लंगोटी में आ गये । 'विदाउट एनी हेजीटेशन' श्यामलाल ने कुलीगिरी शुरू की, फिर कार चलायी, ट्रक के मालिक बने, ट्रंसपोर्ट खोला और आज पुनः करोड़पति हैं । इस प्रकार 'प्राण जाये पर लंगोटी न जाये' वाली बात चरितार्थ होती है ।

आधुनिक काल में साइंस एंड टेक्नोलोजी के विकास का प्रभाव लंगोट पर पड़ना स्वभाविक था । चुंकि औद्योगिक क्रांति यूरोप में हुई थी, इसी कारण लंगोट का प्रचलन युरोप में प्रारंभ हो गया । हां, इसके रूप एवं प्रयोग में बदलाव आ गया । पहले लंगोट पुल्लिंग था, अब अपने नये रूप में यह उभयलिंग हो गया अर्थात् नारियों ने भी इसका इस्तेमाल प्रारंभ कर दिया । नारियों की कोमलता को ध्यान में रखकर उनके लिए नर्म एवं मुलायम कपड़ों से इस वस्तु का निर्माण हुआ ।

अब हम लोग इक्कीसवीं शताब्दी में हैं और आज विज्ञान का विकास चरम सीमा पर है । भेड़ों एवं गायों के हमशक्ल बनाए जाते हैं, कुछ दिनों में आदमियों के हमशक्ल भी बनने लगेंगे । पर क्या वह क्लोन अंडरवीअर नहीं पहनेगा, अवश्य पहनेगा श्रीमान् । अगर नहीं पहनेगा तो सभ्य-समाज उसे बन्दर कहेगा । अतः लंगोट हमारी फन्डामेंटल जरूरत है ।

आज बाजार में हर रंग, डिजाइन और साइज के सस्ते और मंहगे लंगोट उपलब्ध हैं । सेठ जी चालीस इंच का कच्छा पहनते हैं और सेठानी जी बयालिस इंच का । जबकि सेक्सी पतोहू इक्कीस इंच का पहनती है । इन कच्छों को सेठ जी का नौकर रामू धोता है । सेठ जी और सेठानी का सस्ते पाउडर से और कमसिन पतोहू का एरिअल से, सख्त सफाई मगर प्यार से ।

मन्त्री जी धारीदार नाड़ायुक्त एवं गुप्त पाकेटयुक्त अंडरवीअर पहनते हैं । पतली सफेद धोती के भीतर रंगीन धारीदार अंडरवीअर इंद्रधनुषी छटा प्रस्तुत करता है । गुप्त पाकेट में स्विस बैंक के खाते, पासपोर्ट एवं कंडोम रखे जाते हैं ताकि जब भी जरूरत हो, पुलीस एवं सीबीआई से बचने के लिए देश छोड़ा जा सके । जब से मन्त्रियों के नजायज औलादों की संख्या बड़ने लगी, मन्त्रियों ने कंडोम का प्रयोग प्रारंभ कर दिया है ।

आजकल बाजार में हर किस्म का कच्छा उपलब्ध है - काला, सफेद, रंगीन, प्रिन्टेड । कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसका निर्माण कर रहि हैं । नवयुवतियां चोली और कच्छा पहनकर समुद्र के किनारे बालू पर लोटती हैं, जबकि कुछ् उदार किस्म की नवयुवतियां इसे भी उतार कर अद्भुत् दृष्य उपस्थित करती हैं । युवक ऐसे दृष्यों को देख कर बालू पर लोटने लगते हैं, कच्छों की सिलाई टूट जाती है, मगर उनका बैचलर ट्रेडमार्क कायम रहता है । अतः जब तक आपने कच्छा पहन रखा है, आपका शील कायम है । काश महर्षि विश्वामित्र भी लंगोट पहन कर तपस्या करते तो एक क्या आधी दर्जन मेनका भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती । खैर जो बीत गई सो बात गई ।

पुराने जमाने में प्रेमिका अपने परदेश जाते प्रेमी को चुनरी देती थी, जबकि आज कि प्रेमिका अपना यूज किया हुआ पैंटी देती है और कहती है- डार्लिंग, जब भी तुम्हें मेरी याद आये, इसे तुम पहन लेना, तुम मुझे अपने पास फील करोगे । अद्भुत् है यह प्रेमलीला । प्रेम-विज्ञान में पीएचडी श्रीकृष्ण को भी यह आइडिया नहीं आया होगा। शायद किसी पश्चिमी देश में एक सिनेतारिका की एक पैंटी नीलाम की गयी, कहते हैं एक सनकी उद्योगपति ने उसे एक लाख डालर में खरीदा । वह उसे रोज पहनकर उस अभिनेत्री को अपने नजदीक फील करता है । शायद वह दिन दूर नहीं जब बाजार में सेकेंडहैंड अंडरवीअर बिकने लगे । नवयुवक माधुरी दीक्षित का खरीदेगा जबकि बूड़े वहीदा रहमान का । नवयुवती सलमान खान का पहनेगी और अधेड़ औरतें हीमैन धर्मेन्द्र का । ये सभी महानुभाव अपने कच्छों एवं पैंटी की कमाई से मालामाल हो जाएंगे ।

टीवी पर कच्छों का विज्ञापन आता है । एक् विज्ञापन - ' आप X ब्रांड कच्छा पहनिये, शहर के सभी गुंडे आपसे डरेंगे और शहर की सबसे खूबसूरत लड़की आपकी बाहों में होगी ।' क्या वे गुंडे कच्छा नहीं खरीद सकते ? दूसरा विज्ञापन - ' Y ब्रांड कच्छा । एक् नवयुवक Y ब्रांड कच्छा पहनकर समुद्र किनारे रेत पर लेटा है । एक् नवयुवती आती है, Y ब्रांड कच्छा देखती है, फिर नवयुवक के बगल में लेट जाती है । फिर दोनो अपने अपने कच्छों को हवा में पतंग की तरह उड़ा कर एक दूसरे पर लेट जाते हैं । समुद्र में तुफान आता है और साथ ही आकाशवाणी होती है - सावधान यह दुर्घटना आपके साथ भी हो सकती है । ' अतः आपसे निवेदन है कि आप Y ब्रांड का कच्छा पहनकर समुद्र किनारे ना जाएं ।

सन २०५०, अल्ट्रामाडर्न एज । चिकित्सा की एक नयी प्रणाली का विकास हुआ है, बिल्कुल स्वदेशी तकनीक जिसे लंगोट थिरेपी कहते हैं । आपको खुजली है, आप D2 ब्रांड कच्छा पहनें, सात दिनों में आपकी खुजली ठीक हो जाएगी । बबासीर का बिना चीरफाड़ के इलाज - D3X कच्छा पहनें, शर्तिया फायदा होगा । हाइड्रोसील बड़ गया हो तो सिन्थेतिक टेफ्लोन से निर्मित D3Y कच्छा पहनें, एक् महीने में अण्डकोष अंगूर के दाने के बराबर हो जाएगा । वैसे व्यक्ति जो दिन भर में तीन चार नवयुवतियों की थकावट दूर करते हैं, उनके लिये एक खास अल्ट्रा D4Z कच्छा जो इन्स्टेंट एनर्जी द्वारा आपको रिचार्ज करे, इस्तेमाल कर सकते हैं । महिलाओं के लिये स्पेशल D5A पैंटी परिवार नियोजन के लिये । शंका की कोई बात नहिं, १०० % सुरक्षित, पराए पुरुषों का बेझिझक इस्तेमाल कीजिए ।

हाल ही में महामुनि शोध स,न्स्थान ने एक बहुउपयोगी कच्छे का निर्माण किया है । जिसका ट्रेडनेम ब्रह्मचारी १००० है । स्मरण शक्ति बढ़ाए, स्फुर्ति जगाए, जब भी सेक्स की इच्छा हो उसे नियन्त्रित कर जीरो लेवल पर लाए । अमेरिका ने इस संस्थान को एक लाख कच्छों का आर्डर दिया है ।

अन्त में हम हनुमान जी का धन्यवाद करते हैं जिन्होने लंगोट जैसी अद्भुत् वस्तु दी । जै हनुमान जी । लंगोटम् सर्वार्थ साधनम्॥    


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Tuesday, December 30, 2003
pAdukA purANa - पादुका पुराण

पादुका पुराण

'अथ श्री पादुका पुराण'। नहीं न समझे, भला कैसे समझेंगे। आप आधुनिक मानव सदियों पुराने नाम से मुझे भला कैसे पहचानेंगे? श्रीमान् मैं आपका जूता-चप्पल, सैंडल, इत्यादि कई नामों से जाना जाता हूं। तब आप पूछेंगे , भला, पादुका पुराण लिखने की क्या जरूरत आ पड़ी। श्रीमान् आजकल हर कोई अपनी 'ऑटोबॉयोग्राफी' लिख रहा है, या भाड़े पर कोई सस्ता लेखक से 'बॉयोग्राफी' लिखवा रहा है। बात इतनी ही होती तो मैं चुप रहता। सुना है पश्चिमी जगत में किसी महारानी ने अपनी कुतिया की जीवनी लिखी और बाकायदा पुरस्कार भी मिला। मैं तो फिर भी जूता हूं, आपके बड़े काम की चीज। पहनने से लेकर जूतियाने तक मैं आपके काम आता हूं।

खैर मैं अपनी उत्पत्ति के बारे में आपको बताता हूं। मेरी जन्म कथा भी किसी महापुरुष के जन्म की नाटकीयता से कम नहीं है। कहा जाता है कि सदियों पूर्व, या युगों पूर्व कहें तो बेहतर होगा, क्योंकि महाभारत और रामायण के दिनों में खड़ाऊं अत्यधिक प्रचलन में आ गया था। चूंकि खड़ाऊं मेरा प्रारम्भिक रूप है अतः मेरा जन्म द्वापर या त्रेता युग के पहले का है। चूंकि पुरापाषाण कालीन खुदाई में कुछ अवशेष मिले हैं, जिससे यह सन्देह व्यक्त किया जा रहा है कि पहियों के आविष्कार के समय ही जूतों या पादुका का विकास हुआ होगा। ऐसा प्रमाण पुरातत्ववेत्ता दे रहे हैं। चूंकि हमारे भारतवर्ष में पुरानी कहावतों और कहानियों को ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है। अतः मेरी उत्पत्ति से जुड़ी कहानी मैं आपको सुनाता हूं।

प्राचीन काल में एक राजा हुआ करते थे, उनका नाम था, चूंकि प्राचीन काल के राजाओं का रेकॉर्ड काफी खराब रहा है, तो क्यों न उसका नाम, हम शैतान सिंह रख दें। उसकी एक् बेती थी फूलकुमारी, फूल जैसी सुन्दर। एक दिन वो बगीचे में टहल रही थी, कि एक् कांटा चुभ गया। फूलकुमारी मूर्च्छित, राजवैद का आगमन, उपचार, और राजा द्वारा पूरे बगीचे में कालीन बिछाने कि घोषणा (कालीन सरकारी खर्च पर बिछाया गया)। एक दिन फुलकुमारी बगीचे में सहेलियों के साथ लुका-छिपी खेल रही थी कि फिर एक कांटा चुभ गया। फूलकुमारी मूर्च्छित, राजवैद का आगमन, उपचार और राजा द्वारा पूरे बगीचे में कालीन बिछाने कि घोषणा (पुनः कालीन सरकारी खर्च पर बिछाया गया)। अन्धाधुन्ध सरकारी खर्च से राज्य पर वित्तीय संकट छा गया। उस समय विश्व बैंक तो था नहीं जो ऋण उपलब्ध कराता। राजा ने घोषणा करवा दी, जो भी सही सलाह देगा उसकी शादी फूलकुमारी से करवा दी जायेगी। उसी राज्य में एक गरीब किसान रहता था, राम था रामनारायण बाटा। उसने राजा को सलाह दी कि सभी जगह कालीन बिछाने से तो अच्छा है कि क्यों ना राजकुमारी के पांव में ही तलवों के नीचे मखमल की गद्दी बांध दी जाय। उपाय सस्ता और बढ़िया था, राजा ने रामनारायण की शादी फूलकुमारी से करवा दी। रामनारायण के वंशज ने ही आगे चलकर एक मल्टीनेशनल जूता बनाने की कंपनी खोली जो आज दुनिया की नंबर वन जूता बनाने की कंपनी है।

ये तो थी मेरी उत्पत्ति की कहानी। जैसा कि मैंने आपसे कहा सर्वप्रथम तलवों के नीचे मखमल या अन्य कपड़ों की गद्दी बांधी जाती थी, और आज जूतों के नित नये डिजाइन देखने को मिलते हैं। अन्य वस्तुओं की तरह मेरा भी क्रमिक विकास हुआ है। मुझे भी विकास के कई चरणों से गुजरना पड़ा है। सर्वप्रथम चमड़े से जूते का निर्माण रामनारायण 'बाटा' के वंशज ने ही शुरू किया क्योंकि मखमल के जूते मंहगे थे और ड्यूरेबिलिटी भी काफी कम थी। अतः एक टिकाऊ जूते की जरूरत महसूस की जा रही थी। इस कमी को श्यामनारायण बाटा ने पूरा किया। सर्वप्रथम भैंस कि चमड़ी से जूता तैयार किया गया और जूते का एक जोड़ा उस समय के राजा खदेड़न सिंह को भेंट किया गया। कहा जाता है कि खदेड़न सिंह ने खुश होकर श्यामनारायण बाटा को बड़े पैमाने पर जूता निर्माण हेतु वित्तीय सहायता मुहैय्या करायी। बाद में कई जानवरों के चमड़े से जूता निर्माण प्रारम्भ हुआ।

प्रारम्भ में जूता यानि मेरा (मैं बार बार मेरा शब्द क प्रयोग नहीं करूंगा क्योंकि इससे मेरा स्वाभिमान झलकेगा) इस्तेमाल केवल पांव में पहनने के लिये हि किया जाता था। चूंकि हिंदी साहित्य में कहीं कहीं जूते का मुहावरेदार प्रयोग इस बात की ओर इंगित करता है कि जूता मल्टीपरपस वस्तु बन गया है। कहा जाता कि एक नवाब साहब जो स्वभाव से काफी गर्म मिजाज़ थे, एक दिन भोजन कर रहे थे, सब्जी में नमक अधिक था, वे गुस्से से लाल हो उठे, और आसपास कोई अन्य चीज न पाकर उन्होंने जूता उठाकर बेगम साहिबा को मारा, बेगम साहिबा मूर्च्छित हो गयीं और उसके बाद उन्होंने सारी जिन्दगी सब्जी में नमक हिसाब से ही डाला। जूते का चमत्कारिक असर देखकर नवाब साहब ने सारे अपराधों कि सजा जूतों में तब्दील कर दी। मसलन पॉकेटमारी की सजा पीठ पर दस जूते। चोरी और ठगी, सिर पर दस जूते। बलात्कार, एक हजार एक जूते। हत्या, तब तक जूते मारे जाएं जब तक अपराधी मर न जाए। कहा जाता है कि उसी के बाद से कोड़े मारने की सजा आउट ऑफ फैशन हो गयी। आगे चलकर फटे जूतों से मारना, जूते भिगो कर मारना इत्यादि भी फैशन में आया।

प्रारम्भ में मेरा (जूतों का) प्रयोग आवश्यकता के अन्तर्गत किया जाता था, बाद में मेरा दुरुपयोग भि प्रारम्भ हो गया। कई लोगों के लिये मैं विलासिता और प्रतिष्ठा की वस्तु बन गया। कहा जाता है कि एक नवाब साहब ने अपने पड़ोसी नवाब को नीचा दिखाने के लिये एक करोड़ रुपये के जूतों का निर्माण करवाया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जूतों में हीरे जड़े थे और चौबीस कैरेट सोने के तार से कसीदाकारी की गयी थी। हाल ही में एक मुख्यमंत्री के निवास से चार हजार जोड़ी जूतियां जब्त की गयीं (सभी सरकारी खर्च पर खरीदी गयीं थीं)।

प्रारम्भ में मैं सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता था। राजा हो या रंक, सभी एक ही मोची के हाथ क बना जूता पहनते थे। कीमत भी लगभग समान होती थी। कालांतर में उच्च वर्ग ने स्पेशल ऑर्डर पर जूतों का निर्माण करवाना प्रारम्भ किया और आज बाजार में हजारों किस्म के जूते विद्यमान हैं। अमीरों के हजार चोंचले, हर मौके के लिये एक खास जूता। शादी के अलग, नहाने के अलग, बगीचे में घूमने के लिये अलग और शौचालय के लिये अलग। दूसरी ओर एक गरीब हवाई चप्पल पर पूरी जिन्दगी निकाल देता है। गरीबी रेखा इतनी ऊपर उठ गयी है कि कई गरीब नंगे पांव पुरापाषाण काल की ओर बढ़ रहे हैं।

Posted at 11:02 pm by bhagat
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