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'अथ श्री पादुका पुराण'। नहीं न समझे, भला कैसे समझेंगे। आप आधुनिक मानव सदियों पुराने नाम से मुझे भला कैसे पहचानेंगे? श्रीमान् मैं आपका जूता-चप्पल, सैंडल, इत्यादि कई नामों से जाना जाता हूं। तब आप पूछेंगे , भला, पादुका पुराण लिखने की क्या जरूरत आ पड़ी। श्रीमान् आजकल हर कोई अपनी 'ऑटोबॉयोग्राफी' लिख रहा है, या भाड़े पर कोई सस्ता लेखक से 'बॉयोग्राफी' लिखवा रहा है। बात इतनी ही होती तो मैं चुप रहता। सुना है पश्चिमी जगत में किसी महारानी ने अपनी कुतिया की जीवनी लिखी और बाकायदा पुरस्कार भी मिला। मैं तो फिर भी जूता हूं, आपके बड़े काम की चीज। पहनने से लेकर जूतियाने तक मैं आपके काम आता हूं। खैर मैं अपनी उत्पत्ति के बारे में आपको बताता हूं। मेरी जन्म कथा भी किसी महापुरुष के जन्म की नाटकीयता से कम नहीं है। कहा जाता है कि सदियों पूर्व, या युगों पूर्व कहें तो बेहतर होगा, क्योंकि महाभारत और रामायण के दिनों में खड़ाऊं अत्यधिक प्रचलन में आ गया था। चूंकि खड़ाऊं मेरा प्रारम्भिक रूप है अतः मेरा जन्म द्वापर या त्रेता युग के पहले का है। चूंकि पुरापाषाण कालीन खुदाई में कुछ अवशेष मिले हैं, जिससे यह सन्देह व्यक्त किया जा रहा है कि पहियों के आविष्कार के समय ही जूतों या पादुका का विकास हुआ होगा। ऐसा प्रमाण पुरातत्ववेत्ता दे रहे हैं। चूंकि हमारे भारतवर्ष में पुरानी कहावतों और कहानियों को ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है। अतः मेरी उत्पत्ति से जुड़ी कहानी मैं आपको सुनाता हूं। प्राचीन काल में एक राजा हुआ करते थे, उनका नाम था, चूंकि प्राचीन काल के राजाओं का रेकॉर्ड काफी खराब रहा है, तो क्यों न उसका नाम, हम शैतान सिंह रख दें। उसकी एक् बेती थी फूलकुमारी, फूल जैसी सुन्दर। एक दिन वो बगीचे में टहल रही थी, कि एक् कांटा चुभ गया। फूलकुमारी मूर्च्छित, राजवैद का आगमन, उपचार, और राजा द्वारा पूरे बगीचे में कालीन बिछाने कि घोषणा (कालीन सरकारी खर्च पर बिछाया गया)। एक दिन फुलकुमारी बगीचे में सहेलियों के साथ लुका-छिपी खेल रही थी कि फिर एक कांटा चुभ गया। फूलकुमारी मूर्च्छित, राजवैद का आगमन, उपचार और राजा द्वारा पूरे बगीचे में कालीन बिछाने कि घोषणा (पुनः कालीन सरकारी खर्च पर बिछाया गया)। अन्धाधुन्ध सरकारी खर्च से राज्य पर वित्तीय संकट छा गया। उस समय विश्व बैंक तो था नहीं जो ऋण उपलब्ध कराता। राजा ने घोषणा करवा दी, जो भी सही सलाह देगा उसकी शादी फूलकुमारी से करवा दी जायेगी। उसी राज्य में एक गरीब किसान रहता था, राम था रामनारायण बाटा। उसने राजा को सलाह दी कि सभी जगह कालीन बिछाने से तो अच्छा है कि क्यों ना राजकुमारी के पांव में ही तलवों के नीचे मखमल की गद्दी बांध दी जाय। उपाय सस्ता और बढ़िया था, राजा ने रामनारायण की शादी फूलकुमारी से करवा दी। रामनारायण के वंशज ने ही आगे चलकर एक मल्टीनेशनल जूता बनाने की कंपनी खोली जो आज दुनिया की नंबर वन जूता बनाने की कंपनी है। ये तो थी मेरी उत्पत्ति की कहानी। जैसा कि मैंने आपसे कहा सर्वप्रथम तलवों के नीचे मखमल या अन्य कपड़ों की गद्दी बांधी जाती थी, और आज जूतों के नित नये डिजाइन देखने को मिलते हैं। अन्य वस्तुओं की तरह मेरा भी क्रमिक विकास हुआ है। मुझे भी विकास के कई चरणों से गुजरना पड़ा है। सर्वप्रथम चमड़े से जूते का निर्माण रामनारायण 'बाटा' के वंशज ने ही शुरू किया क्योंकि मखमल के जूते मंहगे थे और ड्यूरेबिलिटी भी काफी कम थी। अतः एक टिकाऊ जूते की जरूरत महसूस की जा रही थी। इस कमी को श्यामनारायण बाटा ने पूरा किया। सर्वप्रथम भैंस कि चमड़ी से जूता तैयार किया गया और जूते का एक जोड़ा उस समय के राजा खदेड़न सिंह को भेंट किया गया। कहा जाता है कि खदेड़न सिंह ने खुश होकर श्यामनारायण बाटा को बड़े पैमाने पर जूता निर्माण हेतु वित्तीय सहायता मुहैय्या करायी। बाद में कई जानवरों के चमड़े से जूता निर्माण प्रारम्भ हुआ। प्रारम्भ में जूता यानि मेरा (मैं बार बार मेरा शब्द क प्रयोग नहीं करूंगा क्योंकि इससे मेरा स्वाभिमान झलकेगा) इस्तेमाल केवल पांव में पहनने के लिये हि किया जाता था। चूंकि हिंदी साहित्य में कहीं कहीं जूते का मुहावरेदार प्रयोग इस बात की ओर इंगित करता है कि जूता मल्टीपरपस वस्तु बन गया है। कहा जाता कि एक नवाब साहब जो स्वभाव से काफी गर्म मिजाज़ थे, एक दिन भोजन कर रहे थे, सब्जी में नमक अधिक था, वे गुस्से से लाल हो उठे, और आसपास कोई अन्य चीज न पाकर उन्होंने जूता उठाकर बेगम साहिबा को मारा, बेगम साहिबा मूर्च्छित हो गयीं और उसके बाद उन्होंने सारी जिन्दगी सब्जी में नमक हिसाब से ही डाला। जूते का चमत्कारिक असर देखकर नवाब साहब ने सारे अपराधों कि सजा जूतों में तब्दील कर दी। मसलन पॉकेटमारी की सजा पीठ पर दस जूते। चोरी और ठगी, सिर पर दस जूते। बलात्कार, एक हजार एक जूते। हत्या, तब तक जूते मारे जाएं जब तक अपराधी मर न जाए। कहा जाता है कि उसी के बाद से कोड़े मारने की सजा आउट ऑफ फैशन हो गयी। आगे चलकर फटे जूतों से मारना, जूते भिगो कर मारना इत्यादि भी फैशन में आया। प्रारम्भ में मेरा (जूतों का) प्रयोग आवश्यकता के अन्तर्गत किया जाता था, बाद में मेरा दुरुपयोग भि प्रारम्भ हो गया। कई लोगों के लिये मैं विलासिता और प्रतिष्ठा की वस्तु बन गया। कहा जाता है कि एक नवाब साहब ने अपने पड़ोसी नवाब को नीचा दिखाने के लिये एक करोड़ रुपये के जूतों का निर्माण करवाया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जूतों में हीरे जड़े थे और चौबीस कैरेट सोने के तार से कसीदाकारी की गयी थी। हाल ही में एक मुख्यमंत्री के निवास से चार हजार जोड़ी जूतियां जब्त की गयीं (सभी सरकारी खर्च पर खरीदी गयीं थीं)। प्रारम्भ में मैं सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता था। राजा हो या रंक, सभी एक ही मोची के हाथ क बना जूता पहनते थे। कीमत भी लगभग समान होती थी। कालांतर में उच्च वर्ग ने स्पेशल ऑर्डर पर जूतों का निर्माण करवाना प्रारम्भ किया और आज बाजार में हजारों किस्म के जूते विद्यमान हैं। अमीरों के हजार चोंचले, हर मौके के लिये एक खास जूता। शादी के अलग, नहाने के अलग, बगीचे में घूमने के लिये अलग और शौचालय के लिये अलग। दूसरी ओर एक गरीब हवाई चप्पल पर पूरी जिन्दगी निकाल देता है। गरीबी रेखा इतनी ऊपर उठ गयी है कि कई गरीब नंगे पांव पुरापाषाण काल की ओर बढ़ रहे हैं। |
| pkjain May 10, 2007 06:58 AM PDT I NEED U R CONCENT TO PUBLISH ONE OF YOUR ARTICLE IN MY NEWS PAPER PLZ GIVE ME THAT ON MY ACCOUNT pkjain_modern@yahoo.com or call me 9810267134 i m in delhi editor of madhu sambodh | ||
| anasha June 7, 2004 10:29 PM PDT Dilll ko jit liya apne humare. Bhagatji aap nahi jante apne kita bada kaam kiya hai ish lekh ko likh ke..... Aaj ke yug main awashyekta hai aishe lekh ka,,, ... Koti Koti badhai ho apko.. | ||
| सं February 12, 2004 11:38 PM PST वाह भई, क्या बात है| लेख पढ़ कर मज़ा आ गया | ||
| आलोक February 12, 2004 10:34 AM PST वाह, क्या कहने कमाल है! | ||
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