Entry: langota purANa लंगोट पुराण Sunday, April 25, 2004



langota purANa लंगोट पुराण

शुरुआत कहाँ से करूं यह समझ नहीं पा रहा हूँ, क्योंकि विषय ही मैंने ऐसा चुना है। संकोच भी हो रहा है, पर लिखना भी चाह रहा हूँ। खैर, मैं अपनी झिझक और संकोच को त्याग कर प्रारंभ करता हूँ। सर्वप्रथम आप पाठकगणों को अपनी विषय-वस्तु से अवगत करा दूँ। मैंने हमेशा से ही 'उपेक्षित वस्तुओं' को अपने लेखन का विषय बनाया है। मैं उस वस्तु का नाम लिये बगैर प्रारंभ करता हूँ और आशा करता हूँ कि आप विद्वान पाथकगण 'गेस' कर लेंगे कि 'विषयवस्तु' क्या है।

यह हमारे नियमित इस्तेमाल् की वस्तु है, स्त्री-पुरुष दोनों के काम की चीज है। हर उम्र, हर वर्ग के लोग एसका इस्तेमाल करते हैं। चलिये एक 'क्लू' और देता हूँ, इसका संबंध हमारी पोशाक से है। क्या कहा आपने, 'कमीज' । श्रीमान्, महिलायें भारतवर्ष में कमीज तो पहनतीं नहीं, अगर आप चंद आधुनिक युवतियों को छोड़ दें तो । हमारी गरीब जनता को अभी कमीज जैसी विलासिता की वस्तु उपलब्ध कहाँ ।

आप् अभी तक नहीं समझे और् मुझे भी सीधे-सीधे नाम बताने में संकोच हो रहा है। आइये हम उस वस्तु के क्रमिक विकास और इतिहास को जानने का प्रयास करते हैं । उस वस्तु का सर्वप्रथम प्रयोग किस काल में हुआ इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता है । आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि सर्वप्रथम इसका प्रयोग यूरोप में प्रारंभ हुआ । बाद में यह अन्य देशों में प्रयोग में लाया जाने लगा । अब मैं आपको और 'सस्पेंस' में नहीं रखना चाहता क्योंकि कभी-कभी अत्यधिक उत्सुकता आशानुकूल चीज न पाकर घोर निराशा में बदल जाती है। अत: इस अपराध से बचने के लिये उस वस्तु का नाम बता देता हूँ - लंगोटा, कच्छा, अंडरवीअर, पैण्टी इत्यादि पर्यायवाची शब्द हैं उस वस्तु के ।

जैसा कि मैं कह रहा था , यूरोपीय लोग इसे अपनी देन कहते हैं, जैसा कि हाल ही में उन्होने हळी, तुलसी और बासमती चावल को पेटेंट करवाया है । अतः शायद अंडरवीअर का नंबर आया है । खबरदार जो उन्होने ऐसा किया, दुनिया जानती है कि प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में इसका प्रयोग हो रहा है । वे लोग बारहवीं या चौदहवीं शताब्दी की बात करते हैं जबकि लंगोट का प्रयोग सर्वप्रथम हनुमान जी ने सतयुग में किया था । उस जमाने में लंगोट को पोपुलर करने के लिये हनुमान जी सिर्फ लंगोट पहन कर और गदा कंधे पर लेकर घूमा करते थे । कहा जाता है कि उनकी पर्सनालिटी और 'मसल' देख कर समूची वानर सेना ने लंगोट को अपनाया था । कालांतर में हनुमान जी के नाम पर लंगोट बैचलर का ट्रेडमार्क बन गया । उस जमाने में लंगोट साहस ऐवं संयम का प्रतीक माना जाता था और प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को लंगोट पहनाते थे । इसलिये त्रेतायुग में यशोदा मैया ने श्रीकृष्ण को लंगोट पहनाया था । अतः यह निर्विरोध साबित होता है कि अंडरवीअर या कच्छे का विकास भारतवर्ष में ही हुआ है ।

हनुमान जी ने लंगोट का डिज़ाइन स्वयं तैयार किया था और आज के बड़े बड़े फैशन डिज़ाइनर आश्चर्यचकित हैं कि हनुमान जी के पास ना तो फैशन टेक्नोलोजी में डिप्लोमा था और न ही आज की तरह सिलाई मशीन । हनुमान जी ने कम खर्च में लंगोट का निर्माण कर उसे समाज के हर वर्ग के लिये उपलब्ध करवाया । मजदूर से लेकर राजा तक सभी एक ही लंगोट मेड इन इंडिया पहनते थे जिसका प्रमाण हनुमान जी की प्रतिमाएं हैं जो हर गली और् चौराहे पर स्थापित हैं । सभी प्रतिमाओं में हनुमान जी 'क्लोज़-अप' स्माइल के साथ लंगोट धारण किये रहते हैं । अतः हे पेटेंट धारकों, सावधान! हमसे नहीं तो कम से कम हनुमान जी की गदा से डरो, जिसके एक प्रहार से समूचा युनीवर्स अनबैलेंस हो जाता है, तो तुम्हारी क्या मजाल?

कालांतर में समाज चार वर्गों में विभाजित हुआ । परिणाम स्वरुप लंगोट के विभिन्न रूप विकसित हुए । क्षत्रिय वर्ग जो शासक वर्ग था और जिनका ट्रेडमार्क लग्ज़री था, ने रेशम का लंगोट बनवाया । यह हनुमान जी के लंगोट से थोड़ा भिन्न था । जहाँ हनुमान जी का लंगोट संयम का प्रतीक था अर्थात् एक बार कसकर बांध लेने के बाद अप्सराओं की कामुक अदाएं भी उसे खोल नहीं पातीं थीं, वहाँ लग्ज़री रेशमी लंगोट रमणी की एक अदा पर खुल जाते थे । अर्थात् एकदम कम्फर्टेबल था, दिन भर में कई बार खोला या पहना जा सकता था ।

लंगोट के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ वैश्य वर्ग ने किया । व्यावसायिक मानसिकता के अनुसार उसने गुप्तांगों को ढकने के लिये बने लंगोट में गुप्त थैलियां बनवायीं, जिसमें वे स्वर्णमुद्राएं या कीमती वस्तुओं को रख कर आवागमन कर सकें । यकीन मानिये, सैकड़ों वर्षों तक दूसरे वर्ग के लोगों को इसका आभास तक न हो सका और स्वर्णमुद्राएं गुप्त स्थान पर गुप्त अंगों की चौकीदारी में 'सेफ' रही ।

ब्राह्मणों ने हनुमान जी के लंगोट के साथ किसी प्रकार का छेड़-छाड़ ना कर उसका प्रयोग जारी रखा लेकिन बैचलर ट्रेडमार्क खत्म हो गया । लंगोटधारी साधुओं का एक् वर्ग पनपा जो कहने को तो धैर्य और संयम का प्रतीक था परन्तु व्यवहार में पाखण्डी और धूर्त ।

केवल शूद्रों ने हनुमान जी के लंगोट को आत्मसात किया । वे सिर्फ लंगोट पहनते थे और कठिन मेहनत करते थे ।  न तो उन्होने लंगोट की बनावट को 'मैनीपुलेट' किया और न ही व्यवहारिक तौर पर उसकी प्रतिष्ठा में आंच आने दी ।

मध्य काल में लंगोट की बनावट और उसका प्रयोग विधिवत जारी रहा । ना तो उसके स्वरूप में परिवर्तन आया और न ही व्यवहार में । हाँ, एक खास परिवर्तन जो आया वह यह कि बोलचाल की भाषा और साहित्य में इसके लाक्षणिक प्रयोग प्रारंभ हो गये । जैसे लंगोटिया यार अर्थात् दो ऐसे मित्र जिनकी दोस्ती उस जमाने से हो जब वे लंगोटी पहनते थे ( या कभी कभी पहनते थे, क्योंकि बच्चे बिन कपड़ों के ज्यादा हैंडसम लगते हैं, उनमें समानता का भाव रहता है इसी कारण श्रीकॄष्ण गोपियों के साथ या कभी-कभी गोपिकाओं के साथ इसी रूप में घूमते थे । )
'भागते भूत की लंगोटी' का भी बहुविधि प्रयोग मिलता है । इसका वस्तविक अर्थ है कि जब सब कुछ नष्ट हो रहा हो तो जो कुछ भी मिल जाये तो वही बहुत है । जबकि पुलिस वाले इसका अर्थ कुछ और लगाते हैं । उनके अनुसार अगर भागते हुए भूत की लंगोटी उनके हाथ लग जाय तो वे उस भूत को पाताल से भी खोज निकालेंगे, फिर जिन्दा मानवरूपी अपराधी की क्या बिसात । सच्चाई क्या है, इससे आप भली-भांति परिचित हैं । हाल ही में एक मंत्रीपुत्र एक युवती के शीलहरण के पश्च्यात मौका-ए-वारदात पर अपना लंगोट भूल गया और सूचना पाकर पुलीस समय से पहुंची अर्थात् जब युवती की चरित्र तालिका में शुन्य अंक बचे थे । पुलीस ने लंगोट को अपने प्रशिक्षित किसी विदेशी नस्ल के कुत्ते को सुंघाया, कुत्ता मौक-ए-वारदात पर मूर्छित हो गया। लंगोट को जांच हेतु विदेश भेजा गया है । पुलीस मामले की तहकीकात कर रही है ।

एक खास परिवर्तन यह आया कि लंगोट अब प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया । जैसे - सेठ रामलाल ली लंगोट तक नीलाम हो गयी, अर्थात् सेठ रामलाल कौड़ी-कौड़ी के मुंहताज हो गये । कहते हैं कि एक् बार व्यापार घाटे में श्यामलाल का सब कुछ नीलाम हो गया, वे लंगोटी में आ गये । 'विदाउट एनी हेजीटेशन' श्यामलाल ने कुलीगिरी शुरू की, फिर कार चलायी, ट्रक के मालिक बने, ट्रंसपोर्ट खोला और आज पुनः करोड़पति हैं । इस प्रकार 'प्राण जाये पर लंगोटी न जाये' वाली बात चरितार्थ होती है ।

आधुनिक काल में साइंस एंड टेक्नोलोजी के विकास का प्रभाव लंगोट पर पड़ना स्वभाविक था । चुंकि औद्योगिक क्रांति यूरोप में हुई थी, इसी कारण लंगोट का प्रचलन युरोप में प्रारंभ हो गया । हां, इसके रूप एवं प्रयोग में बदलाव आ गया । पहले लंगोट पुल्लिंग था, अब अपने नये रूप में यह उभयलिंग हो गया अर्थात् नारियों ने भी इसका इस्तेमाल प्रारंभ कर दिया । नारियों की कोमलता को ध्यान में रखकर उनके लिए नर्म एवं मुलायम कपड़ों से इस वस्तु का निर्माण हुआ ।

अब हम लोग इक्कीसवीं शताब्दी में हैं और आज विज्ञान का विकास चरम सीमा पर है । भेड़ों एवं गायों के हमशक्ल बनाए जाते हैं, कुछ दिनों में आदमियों के हमशक्ल भी बनने लगेंगे । पर क्या वह क्लोन अंडरवीअर नहीं पहनेगा, अवश्य पहनेगा श्रीमान् । अगर नहीं पहनेगा तो सभ्य-समाज उसे बन्दर कहेगा । अतः लंगोट हमारी फन्डामेंटल जरूरत है ।

आज बाजार में हर रंग, डिजाइन और साइज के सस्ते और मंहगे लंगोट उपलब्ध हैं । सेठ जी चालीस इंच का कच्छा पहनते हैं और सेठानी जी बयालिस इंच का । जबकि सेक्सी पतोहू इक्कीस इंच का पहनती है । इन कच्छों को सेठ जी का नौकर रामू धोता है । सेठ जी और सेठानी का सस्ते पाउडर से और कमसिन पतोहू का एरिअल से, सख्त सफाई मगर प्यार से ।

मन्त्री जी धारीदार नाड़ायुक्त एवं गुप्त पाकेटयुक्त अंडरवीअर पहनते हैं । पतली सफेद धोती के भीतर रंगीन धारीदार अंडरवीअर इंद्रधनुषी छटा प्रस्तुत करता है । गुप्त पाकेट में स्विस बैंक के खाते, पासपोर्ट एवं कंडोम रखे जाते हैं ताकि जब भी जरूरत हो, पुलीस एवं सीबीआई से बचने के लिए देश छोड़ा जा सके । जब से मन्त्रियों के नजायज औलादों की संख्या बड़ने लगी, मन्त्रियों ने कंडोम का प्रयोग प्रारंभ कर दिया है ।

आजकल बाजार में हर किस्म का कच्छा उपलब्ध है - काला, सफेद, रंगीन, प्रिन्टेड । कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसका निर्माण कर रहि हैं । नवयुवतियां चोली और कच्छा पहनकर समुद्र के किनारे बालू पर लोटती हैं, जबकि कुछ् उदार किस्म की नवयुवतियां इसे भी उतार कर अद्भुत् दृष्य उपस्थित करती हैं । युवक ऐसे दृष्यों को देख कर बालू पर लोटने लगते हैं, कच्छों की सिलाई टूट जाती है, मगर उनका बैचलर ट्रेडमार्क कायम रहता है । अतः जब तक आपने कच्छा पहन रखा है, आपका शील कायम है । काश महर्षि विश्वामित्र भी लंगोट पहन कर तपस्या करते तो एक क्या आधी दर्जन मेनका भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती । खैर जो बीत गई सो बात गई ।

पुराने जमाने में प्रेमिका अपने परदेश जाते प्रेमी को चुनरी देती थी, जबकि आज कि प्रेमिका अपना यूज किया हुआ पैंटी देती है और कहती है- डार्लिंग, जब भी तुम्हें मेरी याद आये, इसे तुम पहन लेना, तुम मुझे अपने पास फील करोगे । अद्भुत् है यह प्रेमलीला । प्रेम-विज्ञान में पीएचडी श्रीकृष्ण को भी यह आइडिया नहीं आया होगा। शायद किसी पश्चिमी देश में एक सिनेतारिका की एक पैंटी नीलाम की गयी, कहते हैं एक सनकी उद्योगपति ने उसे एक लाख डालर में खरीदा । वह उसे रोज पहनकर उस अभिनेत्री को अपने नजदीक फील करता है । शायद वह दिन दूर नहीं जब बाजार में सेकेंडहैंड अंडरवीअर बिकने लगे । नवयुवक माधुरी दीक्षित का खरीदेगा जबकि बूड़े वहीदा रहमान का । नवयुवती सलमान खान का पहनेगी और अधेड़ औरतें हीमैन धर्मेन्द्र का । ये सभी महानुभाव अपने कच्छों एवं पैंटी की कमाई से मालामाल हो जाएंगे ।

टीवी पर कच्छों का विज्ञापन आता है । एक् विज्ञापन - ' आप X ब्रांड कच्छा पहनिये, शहर के सभी गुंडे आपसे डरेंगे और शहर की सबसे खूबसूरत लड़की आपकी बाहों में होगी ।' क्या वे गुंडे कच्छा नहीं खरीद सकते ? दूसरा विज्ञापन - ' Y ब्रांड कच्छा । एक् नवयुवक Y ब्रांड कच्छा पहनकर समुद्र किनारे रेत पर लेटा है । एक् नवयुवती आती है, Y ब्रांड कच्छा देखती है, फिर नवयुवक के बगल में लेट जाती है । फिर दोनो अपने अपने कच्छों को हवा में पतंग की तरह उड़ा कर एक दूसरे पर लेट जाते हैं । समुद्र में तुफान आता है और साथ ही आकाशवाणी होती है - सावधान यह दुर्घटना आपके साथ भी हो सकती है । ' अतः आपसे निवेदन है कि आप Y ब्रांड का कच्छा पहनकर समुद्र किनारे ना जाएं ।

सन २०५०, अल्ट्रामाडर्न एज । चिकित्सा की एक नयी प्रणाली का विकास हुआ है, बिल्कुल स्वदेशी तकनीक जिसे लंगोट थिरेपी कहते हैं । आपको खुजली है, आप D2 ब्रांड कच्छा पहनें, सात दिनों में आपकी खुजली ठीक हो जाएगी । बबासीर का बिना चीरफाड़ के इलाज - D3X कच्छा पहनें, शर्तिया फायदा होगा । हाइड्रोसील बड़ गया हो तो सिन्थेतिक टेफ्लोन से निर्मित D3Y कच्छा पहनें, एक् महीने में अण्डकोष अंगूर के दाने के बराबर हो जाएगा । वैसे व्यक्ति जो दिन भर में तीन चार नवयुवतियों की थकावट दूर करते हैं, उनके लिये एक खास अल्ट्रा D4Z कच्छा जो इन्स्टेंट एनर्जी द्वारा आपको रिचार्ज करे, इस्तेमाल कर सकते हैं । महिलाओं के लिये स्पेशल D5A पैंटी परिवार नियोजन के लिये । शंका की कोई बात नहिं, १०० % सुरक्षित, पराए पुरुषों का बेझिझक इस्तेमाल कीजिए ।

हाल ही में महामुनि शोध स,न्स्थान ने एक बहुउपयोगी कच्छे का निर्माण किया है । जिसका ट्रेडनेम ब्रह्मचारी १००० है । स्मरण शक्ति बढ़ाए, स्फुर्ति जगाए, जब भी सेक्स की इच्छा हो उसे नियन्त्रित कर जीरो लेवल पर लाए । अमेरिका ने इस संस्थान को एक लाख कच्छों का आर्डर दिया है ।

अन्त में हम हनुमान जी का धन्यवाद करते हैं जिन्होने लंगोट जैसी अद्भुत् वस्तु दी । जै हनुमान जी । लंगोटम् सर्वार्थ साधनम्॥    

   8 comments

Sachbol
March 21, 2006   04:48 AM PST
 
आप पूर्णविराम (।) के पहले कदापि स्पेस का प्रयोग नहीं करें। सिर्फ पूर्णविराम के बाद एक स्पेस लगाएँ। अन्यथा वाक्य पहली लाइन में और पूर्णविराम अगली पंक्ति के पहले अक्षर का स्थान ले लेता है। ओटो-लाइन-ब्रेक होट-जोन के कारण ऐसा होता है। देवनागरी के पूर्णविराम में इनबिल्ट मिनिस्पेस पहले सेट है। अतः पूर्णविराम के पूर्व स्पेस टाइप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
Sachbol
March 21, 2006   04:44 AM PST
 
आधुनिक लड़कियाँ एवं महिलाएँ रजस्वला अर्थात् मेन्स होने पर 'केयरफ्री' आदि रक्तसोख पैड अपने लंगोट अर्थात् पैंटी में लगा लेती हैं। जिन्हें पुराने जमाने की महिलाओं तरह धोने की जहमत नहीं उठानी प़ड़ती। बस यूज एंड थ्रो। अधिक स्राव होने पर उन्हें क्यों धोएँ वे? कुछ आर्थिक 'समर्थ' महिलाएँ यूज्ड पैड के साथ यूज्ड पैंटी को भी घूरे पर फेंक आती हैं। किन्तु कई बार पाया जाता है कि उन्हें गली के कुत्ते छिन्न भिन्न करके सड़क बीच फैला देते हैं। जो आनेजानेवाली गाड़ियों साईलैन्सर पाइप के धुवाँ या हवा के झोंके से उड़कर राहगीर मर्दों के ऊपर गिरकर उन्हें 'वीभत्स रस' चखा कर उनमें 'श्मशान वैराग्य' तो पैदा कर ही देते हैं।
Sachbol
March 21, 2006   04:35 AM PST
 
आजकल माँए अपने बच्चों के कच्छे को धोने की जहमत नहीं उठाना चाहती। यूज एँड थ्रो 'हग्गिस' पहना कर ले जाती हैं। एक माँ अपने 6 महीने के बच्चे को रेडीमैड 'हग्गिस' पहना कर पति के साथ सिनेमा देखने चली गई। वापस आकर वे खाना खाकर सो गए। बच्चे की 'हग्गिस' उतारना भूल गए। रात भर में बच्चे ने कई बार टट्टी की। सुबह तक उसे काफी इन्फेक्शन हो गया। डॉक्टर भी उसे बचा नहीं पाए।
anasha
June 7, 2004   11:00 PM PDT
 
Dilll ko jit liya apne humare. Bhagatji aap nahi jante apne kita bada kaam kiya hai ish lekh ko likh ke..... Aaj ke yug main awashyekta hai aishe lekh ka,,, ...

Koti Koti badhai ho apko..
Atul Arora
May 10, 2004   08:37 AM PDT
 
After browsing though Victoria Secret collection (with my wife) , I also thought about getting a hands on in this lucrative buisness. It seems to be a profitable one, and there could be some brands which needs innovations like panty which has neon glow text on it. Or what about printing your counterpart's pic on it?
Faiz
May 9, 2004   04:52 AM PDT
 
You have really researched the topic well ;) I believe this is one area that people should really apply thought to and make sure that the "Indian hand" in the development of the infamous 'langot' is not forgotten. Your efforts towards this goal will surely be a historic landmark. ;) All the best to you !
Sidharth
April 26, 2004   06:38 AM PDT
 
Nice going friend, great to see some thing in hindi.
Sidharth
April 26, 2004   06:38 AM PDT
 
Nice going friend, great to see some thing in hindi.

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